Friday, 20 September 2019
IMC WHEAT GOLD TABLET
SANA IMC HERBAL
SAMTA NAGAR, TIMKI, TIN KHAMB CHOUK, NAGPUR, 9503593007, 7620187007
Sunday, 8 September 2019
Sunday, 4 August 2019
IMC July August Month New Offers 2019
SANA imc HERBAL
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आ गये भारी बरसात वाले आफर?
Friday, 2 August 2019
सिर्फ 5 रुपए में मिलेगी डायबिटीज की बिना साइड इफेक्ट वाली आयुर्वेदिक दवा
डायबिटीज की बिना साइड इफेक्ट वाली दवा
डायबिटीज रोगियों के लिए खुशखबरी है। राष्ट्रीय वनस्पति उद्यान संस्थान 'एनबीआरआई' ने एक हर्बल औषधि तैयार की है, जिसके कोई साइड इफेक्ट नहीं हैं।
संस्थान के प्रमुख वैज्ञानिक एकेएस रावत ने बताया कि हमने टाइप-2 डायबिटीज रोयिगों के लिए एक दवा विकसित की है जो आयुर्वेद के सिद्धांत पर आधारित है। इसके कोई साइड इफेक्ट नहीं है।
उन्होंने बताया कि आम तौर पर एंटीजन शरीर के अंगों पर असर डालते हैं लेकिन हमारी औषधि में एंटी आक्सीडेंट है जो डायबीटीज रोगियों के लिए अच्छा है।
रावत ने बताया कि औषधि को विकसित करने की पहल एनबीआरआई के निदेशक सी एस नौटियाल ने की। औषधि को गोलियों के स्वरूप में दिया जाएगा।
संस्थान के प्रमुख वैज्ञानिक एकेएस रावत ने बताया कि हमने टाइप-2 डायबिटीज रोयिगों के लिए एक दवा विकसित की है जो आयुर्वेद के सिद्धांत पर आधारित है। इसके कोई साइड इफेक्ट नहीं है।
उन्होंने बताया कि आम तौर पर एंटीजन शरीर के अंगों पर असर डालते हैं लेकिन हमारी औषधि में एंटी आक्सीडेंट है जो डायबीटीज रोगियों के लिए अच्छा है।
रावत ने बताया कि औषधि को विकसित करने की पहल एनबीआरआई के निदेशक सी एस नौटियाल ने की। औषधि को गोलियों के स्वरूप में दिया जाएगा।
इस आयुर्वेदिक औषधि का नाम 'बीजीआर-34' रखा गया है और इसकी 100 गोलियों की कीमत पांच सौ रूपए हो सकती है।
रावत ने कहा कि यदि लंबे समय तक ली जाए तो नई औषधि इंसुलिन पर निर्भरता को कम कर सकती है।
प्राकतिक औषधियों से तैयार ये दवाई सीएसआईआर की दो प्रयोगशालाओं एनबीआरआई और सेंट्रल इंस्टीच्यूट ऑफ मेडिसिनल एंड एरोमेटिक प्लांट सी-मैप ने विकसित की है। दोनों ही लखनऊ में हैं।
एनबीआरआई ने दिल्ली की एक फर्म को दवाई के वाणिज्यिक उत्पादन की अनुमति दी है। यही फर्म इसकी मार्केटिंग भी करेगी।
रावत ने बताया कि औषधि चार पौधों से बनी है, जिनका उल्लेख आयुर्वेद में है। यह औषधि पूरी तरह सुरक्षित है।
उन्होंने बताया कि जानवरों पर कराए गये परीक्षणों तथा संबद्ध वैज्ञानिक अध्ययन से पता चला कि यह दवाई पूरी तरह सुरक्षित है और अचूक है। चिकित्सकीय परीक्षणों में 67 प्रतिशत की सफलता दर हासिल हुई है।
रावत ने बताया कि नई दवाई शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है और एंटी आक्सीडेंट के रूप में कार्य करती है।
उन्होंने कहा कि आम तौर पर लगातार एंटीबायोटिक दवाओं के इस्तेमाल से गुर्दे, लीवर और हृदय पर असर पड़ता है लेकिन इस हर्बल औषधि से कोई नुकसान नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि बाजार में कई डायबिटीज नियंत्रक हर्बल औषधियां हैं लेकिन बीजीआर-34 को वैज्ञानिकों ने प्रामाणिक बताया है।
इस दवाई से सामान्य रक्त ग्लूकोज स्तर बना रहेगा। अधिक ब्लड शुगर वाले मधुमेह रोगियों के लिए यह दवाई कारगर है और उन्हें सामान्य जीवन जीने में मदद करेगी।
रावत ने बताया कि 1971 से 2000 के बीच डायबिटीज रोगियों की संख्या दस गुना हो गई है। उन्होंने कहा अनुमान है कि 2011 के आंकडों के मुताबिक भारत में 20 से 79 साल की उम्र वाले 613 करोड़ डायबिटीज रोगी हैं। यह संख्या 2030 तक बढकर 1012 करोड़ होने की आशंका है।
रावत ने कहा कि यदि लंबे समय तक ली जाए तो नई औषधि इंसुलिन पर निर्भरता को कम कर सकती है।
प्राकतिक औषधियों से तैयार ये दवाई सीएसआईआर की दो प्रयोगशालाओं एनबीआरआई और सेंट्रल इंस्टीच्यूट ऑफ मेडिसिनल एंड एरोमेटिक प्लांट सी-मैप ने विकसित की है। दोनों ही लखनऊ में हैं।
एनबीआरआई ने दिल्ली की एक फर्म को दवाई के वाणिज्यिक उत्पादन की अनुमति दी है। यही फर्म इसकी मार्केटिंग भी करेगी।
रावत ने बताया कि औषधि चार पौधों से बनी है, जिनका उल्लेख आयुर्वेद में है। यह औषधि पूरी तरह सुरक्षित है।
उन्होंने बताया कि जानवरों पर कराए गये परीक्षणों तथा संबद्ध वैज्ञानिक अध्ययन से पता चला कि यह दवाई पूरी तरह सुरक्षित है और अचूक है। चिकित्सकीय परीक्षणों में 67 प्रतिशत की सफलता दर हासिल हुई है।
रावत ने बताया कि नई दवाई शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है और एंटी आक्सीडेंट के रूप में कार्य करती है।
उन्होंने कहा कि आम तौर पर लगातार एंटीबायोटिक दवाओं के इस्तेमाल से गुर्दे, लीवर और हृदय पर असर पड़ता है लेकिन इस हर्बल औषधि से कोई नुकसान नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि बाजार में कई डायबिटीज नियंत्रक हर्बल औषधियां हैं लेकिन बीजीआर-34 को वैज्ञानिकों ने प्रामाणिक बताया है।
इस दवाई से सामान्य रक्त ग्लूकोज स्तर बना रहेगा। अधिक ब्लड शुगर वाले मधुमेह रोगियों के लिए यह दवाई कारगर है और उन्हें सामान्य जीवन जीने में मदद करेगी।
रावत ने बताया कि 1971 से 2000 के बीच डायबिटीज रोगियों की संख्या दस गुना हो गई है। उन्होंने कहा अनुमान है कि 2011 के आंकडों के मुताबिक भारत में 20 से 79 साल की उम्र वाले 613 करोड़ डायबिटीज रोगी हैं। यह संख्या 2030 तक बढकर 1012 करोड़ होने की आशंका है।
होम हर्बल औषधियां संभल कर लें, तभी फायदा
होम हर्बल औषधियां संभल कर लें, तभी फायदा
SANA IMC HERBAL
SAMTA NAGAR, TIMKI, TIN KHAMB CHOUK, NAGPUR, 9503593007, 7620187007
प्रकृति के खजाने से जो चीजें हमें मिली हैं, उनमें जड़ी-बूटियां भी हैं। पिछले कुछ सालों में इनकी लोकप्रियता में खासी वृद्धि हुई है। सेहत के लिए इनके तरह-तरह के इस्तेमाल से जुड़ी महत्वपूर्ण बातों का खुलासा कर रही हैं वन्या
भले ही नीम जैसे पेड़ अब घरों में न दिखते हों, पर इनके औषधीय उपचारों ने हमारी जिंदगी में अहम जगह बना ली है। छोटी-बड़ी हर बीमारी की इलाज इनमें छिपा है। त्वचा की बीमारी हो या दांत का दर्द हर जगह ये कारगर हैं। यही वजह है कि पिछले कुछ सालों में हर्बल और आयुर्वेदिक औषधियों की लोकप्रियता में काफी वृद्धि हुई है।
आयुर्वेद एक वैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति है। आयुर्वेद के सिद्धांत में माना जाता है कि कोई भी बीमारी शरीर के प्राण यानी पाए जाने वाले तत्व के असंतुलन के कारण होती है। आयुर्वेद के तीन तत्व हैं, वायु, पित्त और कफ। जब इन तीनों में से किसी में असुंतलन होता है तो इसे दोष कहा जाता है। वात यानी वायु या प्राण, पित्त यानी अग्नि या शरीर, कफ यानी जल या मस्तिष्क। कोई अच्छा वैद्य या आयुर्वेदाचार्य नाड़ी परीक्षण कर इन दोषों की ठीक प्रकार पहचान कर सकता है। जैसे यदि किसी व्यक्ति को वात की अधिकता है तो उसे चक्कर आएंगे, पित्त की अधिकता में सूजन होगी और कफ का असंतुलन पस या बलगम बनाता है।
आम धारणा है कि प्राकृतिक चिकित्सा, घरेलू चिकित्सा और आयुर्वेद एक ही है। लेकिन यह समझना होगा कि आयुर्वेद अपने आप में संपूर्ण चिकित्सा पद्धति है। भले ही आयुर्वेद में ऐलोपैथ की तरह साइड इफेक्ट के मामले ज्यादा न होते हों, लेकिन इसमें भी सावधानी रखना जरूरी होता है। प्रचार माध्यमों में कुछ जड़ी-बूटियों के नाम इतने ज्यादा प्रसारित-प्रकाशित होते हैं कि आम व्यक्तियों को याद हो जाते हैं। आजकल हर किसी को मालूम होता है कि दिमाग तेज चलाने के लिए ब्राह्मी, पेट के लिए हरड़ लाभकारी होती है, अब अगर किसी उत्पाद में दावा किया गया हो कि यह पदार्थ मौजूद है, तो कई बार व्यक्ति इसे तुरंत खरीद लेता है। वह किसी अच्छे आयुर्वेदाचार्य से परामर्श करने की जहमत नहीं उठाता।
डॉ. दामोदर प्रसाद पारे कहते हैं कि आयुर्वेद के सिद्धांत के अनुसार यदि कोई पौधा औषधीय महत्व का है तो इसका मतलब है कि उसकी जड़-फल-फूल-पत्ते-छाल का अलग-अलग महत्व होगा। जैसे कुछ दवाओं में जड़ कारगर होगी, तो हो सकता है उसी पौधे की छाल से बनाया गया क्वाथ अलग महत्व का हो। वह कहते हैं कि अगर आयुर्वेदिक दवाएं सही ढ़ंग से तैयार न की जाएं तो उनके प्रभाव में कमी आ सकती है। इसके अलावा आयुर्वेद दवाओं के साथ-साथ बिना चिकित्सक के परामर्श के ऐलोपैथी या अन्य उपचार किए जाएं, तो ये इतनी कारगर सिद्ध नहीं होती।
उपचार का असर दो व्यक्तियों पर अलग-अलग हो सकता है। आयुर्वेदिक दवाएं असर करने में भी लंबा समय लेती हैं। इन दवाओं के साइड अपेक्षाकृत कम होते हैं। फिर भी कोई आयुर्वेदिक दवा लेते वक्त चिकित्सक से परामर्श जरूर करना चाहिए। यह सुनिश्चित कर लें कि उसके पास बीएएमएस की डिग्री हो। दवा लेने के बाद उसमें क्या सामग्री है यह जरूर पूछें। अगर आपको कोई भी शक हो तो उसका परीक्षण करा लें, क्योंकि कुछ दवाओं में नुकसानदायक तत्व मौजूद होते हैं। जैसे कुछ दवाओं में पारा मिला होता है, जो बहुत नुकसानदायक हैं। इनके इस्तेमाल से शरीर के अंगों को नुकसान पहुंच सकता है। यह सही है कि आमजन में उपयोगिता की दृष्टि से आयुर्वेदिक अधिक कारगर पद्धति है।
इन बातों का रखें ध्यान
च्यवनप्राश, अश्वगंधा, त्रिफला पाउडर आदि आयुर्वेदिक दवाएं खरीदते वक्त इस बात पर ध्यान दें कि डिब्बे पर सामग्री का नाम, मात्र, और वजन लिखा हो। साथ ही किस जड़ या पौधे से यह प्राप्त है इसकी जानकारी भी हो। हालांकि जड़ी-बूटियां प्राकृतिक होती हैं तो व्यक्ति मान कर चलता है कि यह सुरक्षित भी होंगी। लेकिन कई बार ऐसा नहीं होता।
निर्माता यह बताने को बाध्य नहीं है कि आहार संबंधी वस्तु सुरक्षित और लाभकारी है या नहीं। नियम तो यह है कि आपको पता हो कि दवा पर ठीक से शोध कर उसकी समीक्षा की गई हो। जैसे उसे पहले पशुओं पर परीक्षण कर फिर इंसान पर परीक्षण किया गया हो।
ज्यादातर विटामिन सप्लीमेंट यह सुनिश्चित नहीं करते कि ये शुद्ध है या नहीं या इसमें सामग्री की मात्रा कितनी है या जिस मुख्य पदार्थ से यह सप्लीमेंट बनाया गया है वह कितना है। यही वजह है कि यह शुद्ध नहीं होते। इसके अलावा मुख्य पदार्थ की मात्र भी हर सप्लीमेंट में अलग-अलग हो जाती है।
मानक रूप से प्रति गोली में मुख्य पदार्थ की मात्र का प्रतिशत साफ होना चाहिए, जबकि ज्यादातर हर्बल उत्पादों में सारे मिले-जुले पदार्थों की जानकारी होती है। इससे कोई भी व्यक्ति नहीं जान पाता कि मुख्य पदार्थ क्या है और सहायक पदार्थ कौन से हैं।
इन सभी कारणों को देखते हुए आपको चाहिए कि आप किसी अच्छी एवं नामी कंपनी का ही उत्पाद खरीदें। आहार या पोषक पदार्थों में पहले सामग्री की ठीक से जांच करें फिर उसे खरीदें।
अक्सर आपको यह दिक्कत आ सकती है कि कैसे पहचानें कि किस कंपनी की दवा असली या प्रामाणिक होगी और किसकी नहीं। यहां आप जीएमपी प्रमाणित कंपनी की दवा लें।
क्या हैं आसव और आरिष्ट
आयुर्वेद में दवा बनाने के आसव और अरिष्ट दो प्रमुख तरीके हैं। आसव से आश्य है जड़ी के आसवन (डिस्ट्रीलेशन) से तैयार दवा। अरिष्ट का मतलब है कि किसी भी जड़ी का एक चौथाई तैयार काढ़ा जिसे क्वाथ कहा जाता है। अरिष्ट बनाने के लिए प्राचीन पद्धति में क्वाथ को धान, महुआ या गुड़ के साथ लंबे समय रखा जाता था जिससे पगमेंटेशन के बाद अरिष्ट तैयार होता था, लेकिन अब इन्हें तैयार करने के लिए सीमेंट की बड़ी टंकियों का इस्तेमाल किया जाता है।
आयुर्वेद में दवा बनाने के आसव और अरिष्ट दो प्रमुख तरीके हैं। आसव से आश्य है जड़ी के आसवन (डिस्ट्रीलेशन) से तैयार दवा। अरिष्ट का मतलब है कि किसी भी जड़ी का एक चौथाई तैयार काढ़ा जिसे क्वाथ कहा जाता है। अरिष्ट बनाने के लिए प्राचीन पद्धति में क्वाथ को धान, महुआ या गुड़ के साथ लंबे समय रखा जाता था जिससे पगमेंटेशन के बाद अरिष्ट तैयार होता था, लेकिन अब इन्हें तैयार करने के लिए सीमेंट की बड़ी टंकियों का इस्तेमाल किया जाता है।
दवा वही, फार्मूले नये
त्रिकटु प्लस: पाचन क्रिया सुधारता है। सौंठ, काली मिर्च, हरा धनिया, जायफल और अजवायन से बनता है।
अश्वगंधा कंपाउंड: यह एनर्जी टॉनिक है। अश्वगंधा, शतावरी, कुडजू आदि से बनता है।
शतावरी कंपाउंड: महिलाओं के लिए उपयोगी होता है। यह शतावरी, केसर आदि से बनता है।
त्रिफला प्लस: हरीतकी, आमलकी, बिभितकी और अदरक से बनता है।
गोटूकोला कंपाउंड: दिमाग के लिए उपयोगी। गोटूकोला, अश्वगंधा, चंदन, मुलेठी से बना।
हर्बल फज: यह रक्त शोधक है। चंदन, लेमन ग्रास, सौंठ से बनता है।
अर्जुन कंपाउंड: यह हार्ट टॉनिक है। अर्जुन, अश्वगंधा, गुग्गुल और चंदन से बना।
हर्बल दर्दनाशक: यह गोटूकोला, जटामांसी, शंखपुष्पी, जायफल से बना।
सदियां बीतीं, जादू बरकरार
आंवला
इसे अमृतफल भी कहा जाता है। यह विटामिन सी को अच्छा स्नोत है। इसके सेवन से त्वचा रोगों में भी फायदा पहुंचाता है। यह कॉलेस्ट्रॉल कम करता है। मधुमेह रोग में भी काफी फायदा पहुंचाता है।
आंवला
इसे अमृतफल भी कहा जाता है। यह विटामिन सी को अच्छा स्नोत है। इसके सेवन से त्वचा रोगों में भी फायदा पहुंचाता है। यह कॉलेस्ट्रॉल कम करता है। मधुमेह रोग में भी काफी फायदा पहुंचाता है।
अश्वगंधा
अश्वगंधा के बीज, फल और छाल का कई रोगों के उपचार में प्रयोग किया जाता है। त्वचा रोगों में इसका इस्तेमाल लाभकारी होता है।
अश्वगंधा के बीज, फल और छाल का कई रोगों के उपचार में प्रयोग किया जाता है। त्वचा रोगों में इसका इस्तेमाल लाभकारी होता है।
ब्राह्ही
इसके नियमित सेवन से याददाश्त में इजाफा होता है। कई मानसिक रोगों में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है।
इसके नियमित सेवन से याददाश्त में इजाफा होता है। कई मानसिक रोगों में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है।
लहसुन
यह वातहर है। हृदय संबंधी समस्याओं में भी फायदा पहुंचाता है।
यह वातहर है। हृदय संबंधी समस्याओं में भी फायदा पहुंचाता है।
अदरक
पाचन तंत्र को बेहतर करता है। सर्दी-नजले जुकाम में फायदा पहुंचाता है। कॉलेस्ट्रॉल को भी कंट्रोल में रखता है। ब्लड सर्कुलेशन को ठीक रखता है।
पाचन तंत्र को बेहतर करता है। सर्दी-नजले जुकाम में फायदा पहुंचाता है। कॉलेस्ट्रॉल को भी कंट्रोल में रखता है। ब्लड सर्कुलेशन को ठीक रखता है।
नीम
यह अनके रोगों में कारगर हैं। त्वचा रोगों में बहुत लाभ पहुंचाता है। इसका दांतुन करने से काफी फायदा पहुंचता है। यह रक्तशोधक और प्रभावशाली एंटीबायोटिक है।
यह अनके रोगों में कारगर हैं। त्वचा रोगों में बहुत लाभ पहुंचाता है। इसका दांतुन करने से काफी फायदा पहुंचता है। यह रक्तशोधक और प्रभावशाली एंटीबायोटिक है।
त्रिफलायह पाचन क्रिया सुधारता है।
तुलसीसर्दी-जुकाम-खांसी एवं त्वचा रोगों में लाभकारी तुलसी के पांच पत्ते सादे पानी के साथ खाने से स्मरण शक्ति मजबूत होती है। रक्त शुद्धि में भी यह काफी उपयोगी है। तुलसी में थकान दूर करने के अद्भुत गुण हैं। पर संतानोत्पत्ति की चाह रखनेवाली महिलाएं इसके सेवन से बचें।
Thursday, 25 July 2019
अनदेखी की तो खतरनाक रूप ले सकती है पाइल्स की बीमारी, ये तरीके आएंगे काम
पाइल्स की बीमारी
SANA IMC HERBAL
SAMTA NAGAR, TIMKI, TIN KHAMB CHOUK, NAGPUR, 9503593007, 7620187007
पाइल्स यानी बवासीर। इस स्थिति में बैठना भी मुश्किल हो जाता है। यह दो तरह की होती है और नजरअंदाज करने पर गंभीर रूप ले सकती है। जानें इसका इलाज और अन्य जरूरी बातें:
पाइल्स यानी बवासीर एक ऐसी बीमारी है जिसमें बैठना भी मुश्किल हो जाता है। मेडिकल भाषा में इसे हेमरॉइड्स कहा जाता है। इस बीमारी में गुदा (ऐनस) के अंदरूनी और बाहरी क्षेत्र और मलाशय (रेक्टम) के निचले हिस्से की शिराओं में सूजन आ जाती है। इसकी वजह से ऐनस के अंदर और बाहर या किसी एक जगह मस्से जैसी स्थिति बन जाती है, जो कभी अंदर रहते हैं और कभी बाहर भी आ जाते हैं।
बवासीर दो तरह की होती है-खूनी बवासीर और बादी बवासीर। खूनी बवासीर (पाइल्स) में खून आता रहता है, लेकिन दर्द नहीं होता। जबकि बादी बवासीर में पेट में कब्ज बन जाती है और पेट हमेशा ही खराब रहता है। यह बीमारी 45 साल से 65 साल के लोगों में काफी आम है
बवासीर दो तरह की होती है-खूनी बवासीर और बादी बवासीर। खूनी बवासीर (पाइल्स) में खून आता रहता है, लेकिन दर्द नहीं होता। जबकि बादी बवासीर में पेट में कब्ज बन जाती है और पेट हमेशा ही खराब रहता है। यह बीमारी 45 साल से 65 साल के लोगों में काफी आम है
यहां कुछ घरेलू तरीके बताए जा रहे हैं, जो पाइल्स की समस्या से निपटने में मदद कर सकते हैं:
एलो वेरा
एलो वेरा में कई समस्याओं का इलाज छिपा है। यह सिर्फ स्किन को सॉफ्ट और स्पॉटलेस बनाने के लिए ही इस्तेमाल नहीं किया जाता बल्कि पाइल्स की बीमारी में भी यह काफी आराम देता है। हालांकि पाइल्स के लिए फ्रेश एलो वेरा जैल यानी एलो वेरा की पत्ती से तुरंत निकाला गया जैल यूज करना चाहिए। इस जैल को पाइल्स वाले हिस्से में बाहर की तरफ लगाएं। दिन में कम से 2-3 बार इस जैल को लगाएं।
(ध्यान रखें: कुछ लोगों को एलो वेरा से एलर्जी होती है। ऐसे लोग एलो वेरा का इस्तेमाल डॉक्टर से पूछकर करें। नहीं तो स्किन के किसी हिस्से पर लगाकर देख लें कि कहीं दर्द या झनझनाहट तो नहीं हो रही। अगर ऐसा नहीं होता है तो फिर एलो वेरा को पाइल्स के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।)
एलो वेरा
एलो वेरा में कई समस्याओं का इलाज छिपा है। यह सिर्फ स्किन को सॉफ्ट और स्पॉटलेस बनाने के लिए ही इस्तेमाल नहीं किया जाता बल्कि पाइल्स की बीमारी में भी यह काफी आराम देता है। हालांकि पाइल्स के लिए फ्रेश एलो वेरा जैल यानी एलो वेरा की पत्ती से तुरंत निकाला गया जैल यूज करना चाहिए। इस जैल को पाइल्स वाले हिस्से में बाहर की तरफ लगाएं। दिन में कम से 2-3 बार इस जैल को लगाएं।
(ध्यान रखें: कुछ लोगों को एलो वेरा से एलर्जी होती है। ऐसे लोग एलो वेरा का इस्तेमाल डॉक्टर से पूछकर करें। नहीं तो स्किन के किसी हिस्से पर लगाकर देख लें कि कहीं दर्द या झनझनाहट तो नहीं हो रही। अगर ऐसा नहीं होता है तो फिर एलो वेरा को पाइल्स के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।)
आइस पैक
आइस पैक को भी पाइल्स की बीमारी में काफी लाभदायक माना गया है। प्रभावित हिस्से पर आइस पैक से सिकाई करें। चाहे तो बर्फ के टुकड़े लेकर उन्हें एक कपड़े में लपेट लें और फिर प्रभावित हिस्से पर लगाएं। रोजाना 5 से 10 मिनट इस तरह सिकाई करने से पाइल्स की समस्या में आराम मिलेगा।
हॉट वॉटर बाथ
हॉट वॉटर बाथ यानी गरम पानी में नहाने से भी बवासीर यानी पाइल्स में राहत मिलती है। इससे सूजन और खुजली कम हो जाती है। इसके अलावा नारियल का तेल भी फायदा पहुंचाता है। प्रभावित हिस्से पर नारियल तेल लगाने से सूजन और खुजली कम हो जाती है।
इन नुस्खों के अलावा अपने रूटीन और लाइफस्टाइल में कुछ बदलाव करके भी पाइल्स की बीमारी से बचा जा सकता है। जैसे कि:
-रोजाना भरपूर मात्रा में पानी और अन्य तरल पदार्थ पिएं।
-फाइबर से भरपूर खाना खाएं। फाइबर हमारे पाचन सिस्टम के लिए बेहद जरूरी होता है और बाउल मूवमेंट में भी मदद करता है। इसके अलावा फाइबर मल को भी सॉफ्ट बनाने में हेल्प करते हैं ताकि वह आसानी से शरीर से बाहर निकल पाए।
-हल्के और ढीले-ढाले कपड़े पहनें और प्राइवेट हिस्से की नियमित तौर पर सफाई करें।
(नोट: पाइल्स की समस्या होने पर किसी भी तरह की लापरवाही न करें और सिर्फ घरेलू नुस्खों के भरोसे ही न रहें। तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें और इलाज कराएं। नहीं तो यह बीमारी खतरनाक साबित हो सकती है।)
हॉट वॉटर बाथ यानी गरम पानी में नहाने से भी बवासीर यानी पाइल्स में राहत मिलती है। इससे सूजन और खुजली कम हो जाती है। इसके अलावा नारियल का तेल भी फायदा पहुंचाता है। प्रभावित हिस्से पर नारियल तेल लगाने से सूजन और खुजली कम हो जाती है।
इन नुस्खों के अलावा अपने रूटीन और लाइफस्टाइल में कुछ बदलाव करके भी पाइल्स की बीमारी से बचा जा सकता है। जैसे कि:
-रोजाना भरपूर मात्रा में पानी और अन्य तरल पदार्थ पिएं।
-फाइबर से भरपूर खाना खाएं। फाइबर हमारे पाचन सिस्टम के लिए बेहद जरूरी होता है और बाउल मूवमेंट में भी मदद करता है। इसके अलावा फाइबर मल को भी सॉफ्ट बनाने में हेल्प करते हैं ताकि वह आसानी से शरीर से बाहर निकल पाए।
-हल्के और ढीले-ढाले कपड़े पहनें और प्राइवेट हिस्से की नियमित तौर पर सफाई करें।
(नोट: पाइल्स की समस्या होने पर किसी भी तरह की लापरवाही न करें और सिर्फ घरेलू नुस्खों के भरोसे ही न रहें। तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें और इलाज कराएं। नहीं तो यह बीमारी खतरनाक साबित हो सकती है।)
पाइल्स या बवासीर का इलाज
बात करें पाइल्स के इलाज की, तो इसके लिए कई तरीके उपलब्ध हैं। जैसे कि:
1- दवाई के जरिए भी पाइल्स का इलाज किया जा सकता है लेकिन वह भी तब जब पाइल्स स्टेज 1 या 2 का हो। ऐसे में सर्जरी की जरूरत नहीं होती। एनोवेट और फकटू पाइल्स पर लगाने की दवाएं हैं। इनमें से कोई एक दवा दिन में तीन बार पाइल्स पर लगाई जा सकती है। इन दवाओं को डॉक्टर से पूछकर ही लगाना चाहिए।
2- अगर मस्से थोड़े बड़े हैं तो रबर बैंड लीगेशन का प्रयोग किया जाता है। इसमें मस्सों की जड़ पर एक या दो रबर बैंड को बांध दिया जाता है, जिससे उनमें ब्लड का प्रवाह रुक जाता है। इसमें डॉक्टर एनस के भीतर एक डिवाइस डालते हैं और उसकी मदद से रबर बैंड को मस्सों की जड़ में बांध दिया जाता है। इसके बाद एक हफ्ते के समय में ये पाइल्स के मस्से सूखकर खत्म हो जाते हैं।
बात करें पाइल्स के इलाज की, तो इसके लिए कई तरीके उपलब्ध हैं। जैसे कि:
1- दवाई के जरिए भी पाइल्स का इलाज किया जा सकता है लेकिन वह भी तब जब पाइल्स स्टेज 1 या 2 का हो। ऐसे में सर्जरी की जरूरत नहीं होती। एनोवेट और फकटू पाइल्स पर लगाने की दवाएं हैं। इनमें से कोई एक दवा दिन में तीन बार पाइल्स पर लगाई जा सकती है। इन दवाओं को डॉक्टर से पूछकर ही लगाना चाहिए।
2- अगर मस्से थोड़े बड़े हैं तो रबर बैंड लीगेशन का प्रयोग किया जाता है। इसमें मस्सों की जड़ पर एक या दो रबर बैंड को बांध दिया जाता है, जिससे उनमें ब्लड का प्रवाह रुक जाता है। इसमें डॉक्टर एनस के भीतर एक डिवाइस डालते हैं और उसकी मदद से रबर बैंड को मस्सों की जड़ में बांध दिया जाता है। इसके बाद एक हफ्ते के समय में ये पाइल्स के मस्से सूखकर खत्म हो जाते हैं।
3- इस तरीके का इस्तेमाल तभी किया जाता है जब मस्से छोटे होते हैं। स्टेज 1 या 2 तक इस तरीके का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें मरीज को एक इंजेक्शन दिया जाता है। इससे मस्से सिकुड़ जाते हैं और उसके बाद धीरे-धीरे शरीर के द्वारा ही अब्जॉर्ब कर लिए जाते हैं। अगर मस्से बाहर आकर लटक गए हैं तो इस तरीके का इस्तेमाल नहीं किया जाता।
4- मस्से अगर बहुत बड़े हैं और दूसरे तरीके फेल हो चुके हैं तो हेमरॉयरडक्टमी की प्रक्रिया अपनाई जाती है। यह सर्जरी का परंपरागत तरीका है। इसमें अंदर के या बाहर के मस्सों को काटकर निकाल दिया जाता है।
5- स्टेज 3 या 4 के पाइल्स के लिए ही इस तरीके का इस्तेमाल किया जाता है। बाहर निकले हुए मस्से को एक सर्जिकल स्टेपल के जरिये वापस अंदर की ओर भेज दिया जाता है और ब्लड सप्लाई को रोक दिया जाता है जिससे टिशू सिकुड़ जाते हैं और बॉडी उन्हें अब्जॉर्ब कर लेती है।
4- मस्से अगर बहुत बड़े हैं और दूसरे तरीके फेल हो चुके हैं तो हेमरॉयरडक्टमी की प्रक्रिया अपनाई जाती है। यह सर्जरी का परंपरागत तरीका है। इसमें अंदर के या बाहर के मस्सों को काटकर निकाल दिया जाता है।
5- स्टेज 3 या 4 के पाइल्स के लिए ही इस तरीके का इस्तेमाल किया जाता है। बाहर निकले हुए मस्से को एक सर्जिकल स्टेपल के जरिये वापस अंदर की ओर भेज दिया जाता है और ब्लड सप्लाई को रोक दिया जाता है जिससे टिशू सिकुड़ जाते हैं और बॉडी उन्हें अब्जॉर्ब कर लेती है।
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